Monday, May 21, 2007

मुहब्बत की जन्नत















आपकी मुस्कान ने दी जीने की नयी उमंग
आपाके दीदार ने भर दिए जिन्दगी मैं नए रंग

आपके हाथ ने दिया इस भटकते राही को सहारा
आपके साथ ने है इस मुहब्बत की जन्नत को संवारा

1 comment:

MG said...

apne itni tareef kari ki hamse dekha na gaya

hum raee ke pahad se gir pade aur apse dekha na gaya