Thursday, March 15, 2007

आघाज़ ...












रात के अँधेरे दी किसने यह दस्तक
भोर की किरण है किसकी यह चाहचाहट
सुबह के चढ़ते सूरज दी किसने यह जवां
उमंग
शाम के धुंधलके यादों को किसने पिरोया
शब के आघाज़ कौन हुई रुखसत ... जिन्दगी

1 comment:

MG said...

subhaan-allah