Sunday, April 15, 2007

दिल्ली

जागेगी रात भर और
भीगेगी साथ पर कर
डालेगी बेलगाम ख़यालों को
पूछेगी ये सवाल और
मांगेगी ये हिसाब ना
सुनेगी तेरे इन जवाबों को

यहाँ है इक नदी
और वहां है इक लाल किला
पर कहॉ है इस शहर का फलसफा
यहाँ आंसू और गीत
और जवानी थी मैंने तेरे नाम की
आवारा थी रात
और सड़कें थीं सब मेरे बाप की
और मैं था
तू थी और थी दिल्ली बस

कहीं कोई उड़ रहा है
कहीं कोई गिर रहा है
कहीं कोई है खड़ा कगार पे
कहीं कोई खेले जुआ
कहीं कोई बने गुलाम
कहीं कोई है पड़ा इंतज़ार में
जब गया कल मैं क़ुतुब मीनार
और सुना था मैंने ऐलान
कि बनी है यहाँ इक नयी पार्टी
आवारा है नाम
भटकना जिसका विधान है
फुर्सत है काम
कुछ धुंधला सा जिसका निशां है
वहां मैं था
तू थी और थी दिल्ली बस

देखे यहाँ कई मौसम बदलते हुए
देखे जज्बे कई यहाँ पत्थर बनते हुए
कई वक़्त से पहले
सब आज तू कह ले
आवारा है नाम
भटकना अपना विधान है
फुर्सत है काम
कुछ धुंधला सा जिसका निशां है
वहां मैं था
तू थी और थी दिल्ली बस

देखे यहाँ कई मौसम बदलते हुए
देखे जज्बे कई यहाँ पत्थर बनते हुए
कई वक़्त से पहले
सब आज तू कह ले
आवारा है नाम
भटकना अपना विधान है
फुर्सत है काम
कुछ धुंधला सा जिसका निशां है
वहां मैं था
तू थी और थी दिल्ली बस

- रब्बी शेरगिल

1 comment:

MG said...

thank god for rabbi shergill. i was having tough time believing that someone can be as passionate about delhi as you are. for long i have hated this city and the guts of its people. but i will confess that with the passage of time, i am coming to grips with the image of my future in this city... hence your job, my friend, is to shield this dream from shattering :-)

...wahan main thaa, tu thee aur thee dilli bas...