Monday, March 3, 2008

मंजिल से बेहतर लगने लगे हैं ये रास्ते

हम जो चलने लगे
चलने लगे हैं ये रास्ते

हाँ हाँ
मंजिल से बेहतर लगने लगे हैं ये रास्ते

आओ खो जायें हम
हो जायें हम यूं लापता

आओ मिलो चलें
जाना कहाँ ना हो पता

हम जो चलने लगे
चलने लगे हैं ये रास्ते
हाँ हाँ

मंजिल से बेहतर लगने लगे हैं ये रास्ते

बैठे बैठे ऐसे कैसे कोई
रास्ता नया सा मिले
तू भी चले में भी चलूँ
होंगे कम ये तभी फासले

आओ तेरा मेरा ना हो किसी से वास्ता
आओ मिलो चले जाना
कहाँ ना हो पता

हम जो चलने लगे
चलने लगे हैं ये रास्ते
हाँ हाँ
मंजिल से बेहतर लगने लगे हैं ये रास्ते

आँखें खोले नींदें बोले जाने
कैसे लगी बेखुदी
यहाँ वहाँ देखो कहाँ
लेके जाने लगी बेखुदी
आओ मिल जायें ना हो जहाँ पे रास्ता

आओ मिलो चलें
जाना कहाँ ना हो पता

हम जो चलने लगे
चलने लगे हैं ये रास्ते
हाँ हाँ
मंजिल से बेहतर लगने लगे हैं ये रास्ते

- इरशाद कामिल (२००७)